Highlights
- जहूर अहमद दार ने 1990 के दशक से अब तक 111 से ज्यादा मंदिरों की देखभाल की।
- आतंकवाद के डर में भी वह चुपचाप मंदिरों तक जाते रहे, किसी को काम की जानकारी नहीं दी।
- हिंदू-मुस्लिम एकता को कश्मीर की शान बताते हुए दार ने सभी धार्मिक स्थलों को पवित्र बताया।
श्रीनगर: जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद के दौर में जब बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी से चले गए और कई मंदिरों में पूजा-पाठ बंद हो गया, तब कुछ स्थानीय मुसलमानों ने इन धार्मिक स्थलों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाई। बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ इलाके के रहने वाले जहूर अहमद दार की कहानी भी इसी भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल है। उनका दावा है कि उन्होंने 1990 के दशक से अब तक कश्मीर के 111 से ज्यादा मंदिरों की देखभाल की है।
'मंदिरों की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा था'
जहूर अहमद दार 'नेशनल सोशलिस्ट लीग ऑफ इंडिया' से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा और कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर जाना पड़ा, तब मंदिरों की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा था। धीरे-धीरे कई पुराने और ऐतिहासिक मंदिर जर्जर होने लगे। ऐसे समय में उन्होंने इन मंदिरों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली, जब मंदिरों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था।
'...तब मैंने पूरे कश्मीर में मंदिरों की देखभाल की'
जहूर अहमद ने इंडिया टीवी से बातचीत में बताया कि 1990 के दशक में उनका सबसे बड़ा योगदान मंदिरों की देखभाल करना था। उन्होंने कहा,
'90 के दशक में जब सभी कश्मीरी पंडित चले गए थे, तब मैंने पूरे कश्मीर में मंदिरों की देखभाल की। किसी को यह तक पता नहीं था कि इन मंदिरों की देखभाल कौन कर रहा है। चाहे अनंतनाग हो, हंदवाड़ा हो या घाटी का कोई दूसरा इलाका, मुझे मंदिरों की स्थिति देखने के लिए हर जिले में जाना पड़ता था।'
जहूर अहमद दार ने बताया कि उस समय करीब 75 फीसदी मंदिर जर्जर हालत में थे। हालांकि, जैसे-जैसे कश्मीर के हालात सुधरे, इन मंदिरों को दोबारा ठीक करने का काम शुरू हुआ। उन्होंने जिन मंदिरों की देखभाल में भूमिका निभाई, उनमें ज्येष्ठा देवी मंदिर, राजभवन के पास का मंदिर और हंदवाड़ा का भद्रकाली मंदिर भी शामिल हैं।
साथी के साथ मिलकर की मंदिरों की देखभाल
जहूर अहमद ने अपने साथी एम.के. पंडिता का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, पंडिता खुद कई मंदिरों की देखभाल करते थे और उन्होंने इस काम में उनका काफी साथ दिया। उन्होंने कहा कि उस समय वे दोनों ही मुख्य रूप से यह जिम्मेदारी निभा रहे थे। एम.के. पंडिता पंडित समुदाय की तरफ से और जहूर अहमद मुस्लिम समुदाय की तरफ से मंदिरों की देखभाल कर रहे थे। दोनों अलग-अलग इलाकों में जाकर मंदिरों की स्थिति देखते थे। उन्हें लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मंदिरों को कोई नुकसान न पहुंचे और वहां सब कुछ सुरक्षित रहे।
डर के बावजूद चुपचाप मंदिरों तक जाते थे
90 का दशक कश्मीर के लिए बेहद मुश्किल दौर था। ऐसे माहौल में मंदिरों की देखभाल करना आसान नहीं था। जहूर अहमद ने बताया कि उन्हें भी बहुत डर लगता था, लेकिन उन्होंने किसी को अपने इस काम की जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा,
'मैं बहुत डरा हुआ था। मैं किसी को नहीं बताता था कि मैं क्या काम कर रहा हूं। मैं चुपचाप मंदिरों में जाता था। चाहे श्रीनगर हो, बडगाम, हंदवाड़ा या पुलवामा, मैं किसी को नहीं बताता था कि मैं मंदिर जा रहा हूं। अगर कोई पूछता था कि कहां जा रहे हो, तो मैं कह देता था कि कुछ काम है।'
जहूर के मुताबिक, उन्हें डर था कि अगर लोगों को उनके काम के बारे में पता चल गया तो कोई उनका पीछा कर सकता है या उन्हें ट्रैक कर सकता है। उस समय खतरा इतना ज्यादा था कि उन्होंने मंदिरों की देखभाल से जुड़ी अपनी गतिविधियों को पूरी तरह गुप्त रखा।
'कश्मीर में करीब 111 मंदिरों की देखभाल की'
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर कितने मंदिरों की देखभाल की, तो जहूर अहमद ने संख्या लगभग 111 मंदिर बताई। उन्होंने कहा,
'पूरे कश्मीर में करीब 111 मंदिर हैं, जिनकी देखभाल मैंने खुद की है।'
यह काम उन्होंने ज्यादातर अकेले किया। हालांकि, कुछ मौकों पर एम.के. पंडिता भी उनके साथ जाते थे। जहूर अहमद ने बताया कि पंडिता एक ट्रस्ट के प्रभारी भी थे और जरूरत पड़ने पर उनके साथ मंदिरों का दौरा करते थे।
शीतल नाथ मंदिर की भी करते थे देखभाल
जिस शीतलनाथ मंदिर में बातचीत के दौरान जहूर अहमद मौजूद थे, उसके बारे में भी उन्होंने बताया कि उन्होंने 1990 के दशक में इसकी देखभाल की थी। अब मंदिर का प्रबंधन संबंधित लोगों को सौंप दिया गया है और वे खुद इसकी देखरेख करते हैं। बता दें कि इस मंदिर में 36 साल बाद घंटियां गूंजी हैं और कश्मीरी पंडितों ने हवन-पूजन किया है। जहूर अहमद ने कहा,
'90 के दशक में मैं श्रीनगर के सभी मंदिरों की देखभाल करता था। मैं सुबह-शाम मंदिरों में जाता था। जब भी समय मिलता, मैं खुद वहां जाता था। चाहे लाल चौक हो, हब्बा कदल हो या श्रीनगर की कोई दूसरी जगह, मैं मंदिरों की स्थिति देखने जाता था।'
'अल्लाह ने मुझे इस काम के लिए चुना है'
इतने मुश्किल दौर में आखिर उन्हें यह काम करने की ताकत कहां से मिली? इस सवाल पर जहूर अहमद ने कहा कि उन्हें अल्लाह की मदद और कृपा से रास्ता मिलता रहा। उन्होंने कहा,
'बस अल्लाह की मदद थी। अल्लाह की कृपा मुझ पर थी। उन्होंने मुझे रास्ता दिखाया और बताया कि मुझे क्या करना है। वही मेरी सबसे बड़ी ताकत थी।'
जर्जर मंदिरों को देखकर उन्हें कैसा महसूस होता था, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें एक तरह की आध्यात्मिक शांति मिलती थी। उन्होंने बताया कि वह अपनी दरगाहों पर भी जाते थे और मंदिरों की भी देखभाल करते थे। उन्होंने कहा,
'दिन के आखिर में मुझे लगता था कि मैंने कुछ हासिल किया है। सिर्फ इस दुनिया के लिए नहीं, बल्कि उस दुनिया के लिए भी जहां हमें इस जिंदगी के बाद जाना है।'
खंडहर से फिर मंदिर बना तो खुशी हुई
जहूर ने कहा कि जब उन्होंने उस मंदिर को दोबारा सुंदर रूप में तैयार देखा, जहां कभी खंडहर थे, तो उन्हें बेहद खुशी हुई। उन्होंने कहा कि जहां पहले उजाड़ और खंडहर थे, वहां अब एक सुंदर बगीचा है। चारों तरफ फूल हैं और मंदिर को खूबसूरती से तैयार किया गया है। मंदिर में फिर से प्रार्थनाएं हो रही हैं और घंटियां बज रही हैं। जहूर अहमद ने इसे कश्मीर की शान बताते हुए कहा,
'हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई, हम सब एक हैं। कश्मीर में हमारे सभी धार्मिक स्थल पवित्र हैं। असल में यह इंसान की सोच पर निर्भर करता है। हर कोई एक जैसा नहीं सोचता। लेकिन भगवान लोगों को किसी खास मकसद को पूरा करने के लिए भेजते हैं। वह उनके दिल में यह इरादा डालते हैं और वे उस पर अमल करते हैं। शायद अल्लाह ने मुझे इस काम के लिए चुना है, इसलिए मैं बस इसे पूरा कर रहा हूं।'
कश्मीरियत और भाईचारे की कहानी
जहूर अहमद दार की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह कश्मीर के उन हिस्सों की तस्वीर भी दिखाती है, जहां मुश्किल हालात के बावजूद अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों के प्रति सम्मान बना रहा। 1990 के दशक के बेहद कठिन दौर में जब कई मंदिर वीरान हो गए थे, तब जहूर अहमद जैसे स्थानीय लोगों ने उनकी देखभाल की। उनके मुताबिक, उन्होंने सालों तक बिना किसी प्रचार और डर के मंदिरों की निगरानी की।
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